बृहत्संहिता में बताया गया वास्तुशास्त्र का वैवाहिक जीवन पर प्रभाव

Authors

  • डाॅ. जोगिन्द्र सिंह Author

DOI:

https://doi.org/10.8855/vpmszd87

Abstract

ज्योतिष के त्रिस्कन्धों में वर्णित नियमों के अंतर्गत वास्तु शास्त्र का विषय है। वास्तु शास्त्र वैदिक काल से ही विद्यमान है। इसलिए भी कहा गया है कि ज्योतिष विद्या वैज्ञानिक है। वैदिक ऋषियों ने भी इस वास्तुशास्त्र को आवश्यक रूप से परिभाषित किया है। यह प्राचीन काल की तरह आज भी महत्वपूर्ण है। आचार्य वराह मिहिर ने बृहत्संहिता में इस महत्वपूर्ण विषय को बहुत विस्तार से उद्धृत किया है। मानव जीवन केवल शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सुखों को प्राप्त करने के लिए वास्तु के लक्षणों को ज्योतिषीय दृष्टिकोण से जांच कर सकता है। इसलिए यहां वास्तु विषय को सावधानीपूर्वक प्रतिपादित किया गया है। जिनमें वास्तु विद्या, प्रतिमा लक्षण, प्रासादलक्षण, वज्रलेप आदि हैं, जो विशिष्ट मुहुर्त परक हैं। स्थापत्य कला का वास्तुशास्त्र एक अलग क्षेत्र है। इसी उद्देश्य से प्राचीन काल से ही अन्य आचार्यों ने वास्तु पर विचार किया है।भृगुरनिर्वशिष्टश्च विश्वकर्मा यमस्तया।

Published

2013-2025

Issue

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Articles