बिहुला विषहरी लोक नाटक में आहार्य का महत्व

Authors

  • आनंद विजय Author

DOI:

https://doi.org/10.8855/0pe9zt20

Abstract

बिहुला बिषहरी अंग प्रदेश(बिहार के मुंगेर,भागलपुर, पूर्णिया,बांका जिला इसके अंतर्गत आते हैं।) का एक प्रसिद्ध लोक नाटक है, जो महिला की हिम्मत, उसकी भक्ति और लोक आस्था को दर्शाता है। इस नाटक में जो कपड़ा-लत्ता, गहना-गुरिया, सजावट, और रंग-बिरंगी चीजें इस्तेमाल होती हैं, उसे ही आहार्य कहते हैं। आहार्य कोई साधारण चीज नहीं होती – ये नाटक के किरदारों की पहचान बनती है, और बिना बोले ही बहुत कुछ कह जाती है।
बिहुला के लाल पीले कपड़े, बिषहरी के सांप जैसे रूप, मंच पर नाव, कलश, और फूलों की सजावट – सब मिलकर नाटक के माहौल को सजीव बनाते हैं। इस नाटक में कई जगह मंजूषा चित्रकला भी दिखाई देती है, जो कि भागलपुर की लोक पेंटिंग है और इसमें देवी, नाग, नाव आदि के चित्र बनाए जाते हैं।
आजकल कुछ लोग इस नाटक को नए ढंग से मंचित कर रहे हैं, पर सवाल ये उठता है कि क्या नए जमाने के कपड़े-साजो-सज्जा, इस परंपरागत नाटक की आत्मा को कमजोर तो नहीं कर रहे?
इस शोध में शोधकर्ता बिहुला विषहरी लोकनाटक का विश्लेषणात्मक तथा अनुभवतमक अवलोकन किया है तथा इसका उद्देश्य आहार्य कैसे नाटक को लोक जीवन से जोड़ता है, और इसका क्या मतलब होता है आम दर्शक के लिए। साथ ही यह भी समझने की कोशिश की गई है कि इस परंपरा को बचाते हुए इसमें कैसे नए प्रयोग किए जा सकते हैं।

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Published

2013-2025