दलित-विमर्श प्रासंगिकता एवं उपयोगिता
DOI:
https://doi.org/10.8855/td3rpk42Abstract
दलित-विमर्श आधुनिक भारतीय साहित्य और सामाजिक अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली क्षेत्र बन चुका है, जो समाज के उस वर्ग की पीड़ा, संघर्ष और चेतना को स्वर प्रदान करता है जिसे लंबे समय तक बहिष्कृत, शोषित और उपेक्षित किया गया। यह विमर्श न केवल दलित समुदाय की ऐतिहासिक पीड़ा को रेखांकित करता है, बल्कि सामाजिक संरचनाओं में व्याप्त असमानताओं और भेदभावों पर भी सवाल उठाता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक और विविधतापूर्ण समाज में दलित-विमर्श की प्रासंगिकता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है क्योंकि यह विमर्श समता, न्याय, और समान अवसर की अवधारणाओं को मजबूती प्रदान करता है। दलित-विमर्श की उपयोगिता इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है कि यह समाज के उस वर्ग को अपनी अस्मिता, अधिकार और आत्मसम्मान की पहचान देता है, जो सदियों से जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का शिकार रहा है। दलित साहित्य, दलित आंदोलनों और दलित चिंतन के माध्यम से यह विमर्श सामाजिक चेतना को जाग्रत करता है और समाज के सभी वर्गों को समावेशी दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करता है। दलित लेखकों द्वारा लिखे गए आत्मकथात्मक साहित्य, कविताएँ, कहानियाँ और उपन्यास केवल उनके अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे एक बड़े सामाजिक संवाद की ओर इशारा करते हैं। आज जब हम समावेशी विकास, सामाजिक न्याय और समान अधिकारों की बात करते हैं, तब दलित-विमर्श एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है। यह केवल सामाजिक क्रांति का माध्यम नहीं है, बल्कि शैक्षणिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी एक सशक्त हस्तक्षेप है। यह विमर्श समाज को आत्मचिंतन करने और अपनी ग़लतियों को स्वीकार कर सुधार की ओर बढ़ने का अवसर देता है। शिक्षा, आरक्षण, भूमि अधिकार, रोजगार और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दे दलित-विमर्श के केंद्रीय विषय हैं जो सामाजिक नीति-निर्माण को भी प्रभावित करते हैं। दलित-विमर्श ने भारतीय साहित्य में एक नई दृष्टि और भाषा का सृजन किया है, जो संवेदना, प्रतिरोध और स्वाभिमान की भाषा है। यह विमर्श यह स्पष्ट करता है कि साहित्य केवल सौंदर्य और कल्पना की वस्तु नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ को बदलने का एक प्रभावशाली उपकरण भी है। दलित-विमर्श ने उन अनुभवों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया है जिन्हें प्रायः 'हाशिए' पर रखा गया था। अतः यह कहा जा सकता है कि दलित-विमर्श आज केवल एक साहित्यिक आंदोलन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अत्यंत आवश्यक और प्रासंगिक हिस्सा बन चुका है। इसकी उपयोगिता केवल दलित समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि एक समतामूलक, न्यायसंगत और मानवतावादी समाज के निर्माण में यह विमर्श सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। वर्तमान समय में सामाजिक एकता, समरसता और समानता की दिशा में दलित-विमर्श की भूमिका अत्यधिक महत्त्वपूर्ण और अपरिहार्य बन गई है।