हिंदी के प्रचार-प्रसार में प्रवासी महिला कथाकारों का योगदान
DOI:
https://doi.org/10.8855/ewyk5n05Abstract
हिंदी भाषा तथा हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार में प्रवासी साहित्यकारों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसमें पुरुषों के समान ही महिलाओं का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। महिला लेखिकाओं के लिए पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए लेखन के क्षेत्र में सक्रिय योगदान देना बहुत ही मुश्किल होता है। इसके साथ ही वे साहित्य के क्षेत्र में भी संघर्ष और चुनौतियों का सामना करती है। इन सब परिस्थितिगत परेशानियों के बाद भी स्त्री लेखन विशेषतः प्रवासी महिला-लेखन का कार्य निरन्तर प्रगति पथ पर बढ़ता जा रहा है।
वर्तमान समय में कई महिला कथाकारों ने उच्चकोटि के साहित्य की रचना की है, जिसमें सुधा ओम ढींगरा, उषा प्रियंवदा, उषा राजे सक्सेना, ज़क़िया जुबैरी, पुष्पिता अवस्थी, सुषम बेदी, दिव्या माथुर, अचला शर्मा, जय वर्मा, अनीता कपूर, पूर्णिमा वर्मन, शैलजा सक्सेना, नीना पाल आदि प्रमुख है। इनकी कथाओं में प्रस्तुत अथवा अप्रस्तुत रूप में वर्तमान परिवेश की झलक, बदलते जीवन मूल्य स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इन प्रवासी महिला कथाकारों ने प्रवास में उपजे दुःख-दर्द की संवेदनाएँ व्यक्त करने के साथ अपने देश की संस्कृति को भी दर्शाया है। इनके कथा साहित्य में अनुभूति, उदासी, अकेलापन, दाम्पत्य कलह, व्यक्तियों की दुर्दशा, मनुष्यों का भटकाव, संघर्ष का शिकार अबोध बच्चे, विवाह-विच्छेदन, पुनर्विवाह, सौतेले माता-पिता आदि अनेक विषयों को अपने साहित्य का विषय बनाया जो सामान्य जन के जीवन को सूक्ष्मातिसूक्ष्म चित्रण करते है।
