स्वतंत्रता के पश्चात भारत में दलित पैंथर आन्दोलन का एतिहासिक विश्लेषण

Authors

  • डॉ सुरेन्द्र सिंह Author

DOI:

https://doi.org/10.8855/a4xsea11

Abstract

सामाजिक आन्दोलन सामूहिक व्यवहार का एक स्वरूप है। यह सामाजिक उद्विकास, प्रगति और विकास की भांति ही परिवर्तन का एक ढंग भी है। मानव अपने व्यवहार की अभिव्यक्ति दो प्रकार से कर सकता है, व्यक्तिगत तौर पर और सामुहिक तौर पर सामूहिक तौर पर किया गया व्यवहार या तो समाज व्यवस्था का पोषक होता है या उसका विरोधी। सामाजिक आन्दोलनों का संचालन समाज तथा संस्कृति में नवीन परिवर्तन लाने अथवा नवीन परिवर्तनों का विरोध करने के लिए होता है। सामाजिक आन्दोलनों का उद्देश्य सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्रों में आंशिक अथवा आमूल-चूल परिवर्तन लाना हो सकता है। सामाजिक आन्दोलनों के पीछे कोई विचारधारा अवश्य होती है। किसी आन्दोलन का प्रारम्भ पहले असंगठित रूप में होता है और धीरे-धीरे उनमें व्यवस्था व संगठन पैदा हो जाता है। विगत वर्षों में दलित जातियों ने अपनी सामाजिक-आर्थिक दशाओं को सुधारने तथा देश के अन्य समूहों के द्वारा उन पर किये जाने वाले अन्यायों और अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाने की दृष्टि से अनेक आन्दोलन किये हैं।

Downloads

Published

2013-2025

Issue

Section

Articles