21वीं सदी के वैश्विक दंगों और जातीय संघर्षों के समाधान में सत्याग्रह और अहिंसा की प्रासंगिकता

Authors

  • Raviranjan Author

DOI:

https://doi.org/10.8855/ay1j2r81

Abstract

   प्रस्तुत शोध पत्र 21वीं सदी के समकालीन भू-राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में बार-बार उभरने वाले वैश्विक दंगों, नागरिक अशांति और जातीय संघर्षों   के विनियामक समाधान के रूप में गांधीवादी दर्शन के दो कोर उपकरणों  सत्याग्रह और श्अहिंसाश् की व्यावहारिक और वैधानिक प्रासंगिकता का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है। 21वीं सदी के संघर्ष अब केवल भौगोलिक सीमाओं या पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं हैंय वे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा संचालित एल्गोरिद्मिक नफरत (।सहवतपजीउपब भ्ंजम), और पहचान की बहुसंख्यकवादी व अल्पसंख्यकवादी आक्रामक राजनीति से विरूपित हैं। इस पृष्ठभूमि में, यह अध्ययन पारंपरिक श्सैन्य-केंद्रित सुरक्षा प्रतिमान (ैजंजम-ब्मदजतपब ैमबनतपजल च्ंतंकपहउ) के विपरीत एक श्मानव-केंद्रितश् और नैतिक-दार्शनिक विकल्प प्रस्तुत करता है। प्राथमिक स्रोतों (गांधीवादी वाङ्मय) और समकालीन वैश्विक संघर्षों (जैसेकृयूरोप और अमेरिका में नस्लीय दंगे, पश्चिम एशिया और अफ्रीका के जातीय नरसंहार) के केस स्टडीज के माध्यम से यह शोध पत्र यह सिद्ध करता है कि सत्याग्रह केवल एक निष्क्रिय प्रतिरोध (च्ंेेपअम त्मेपेजंदबम) नहीं है, बल्कि यह संरचनात्मक हिंसा (ैजतनबजनतंस टपवसमदबम) को भीतर से विखंडित करने वाली एक सक्रिय, गतिशील और हाइब्रिड-लचीली (भ्लइतपक-त्मेपसपमदज) कूटनीतिक वास्तुकला है।

Downloads

Published

2013-2025

Issue

Section

Articles