मध्यकालीन भारतीय शहरीकरण और निर्गुण कवियों की सामाजिक आलोचना: कबीर के संदर्भ में एक अंतर्संबंधात्मक अध्ययन

Authors

  •  पूर्णिमा चौबे। Author

DOI:

https://doi.org/10.8855/emtsek43

Abstract

मध्यकालीन भारत में शहरीकरण केवल नगरों की संख्या में वृद्धि नहीं था, बल्कि उत्पादन, व्यापार, श्रम-विभाजन, मौद्रीकरण और सामाजिक संबंधों के पुनर्गठन का एक व्यापक ऐतिहासिक प्रसंग था। इस बदलती आर्थिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि ने निर्गुण भक्ति को नई भाषावली, नई संवेदनशीलता और प्रतिवादी स्वर प्रदान किया। खासकर कबीर की कविता में बाजार, करघा, श्रम, बीज, धन, पाखंड और जाति-सम्बंधी बिंब बार-बार आते हैं; ये बिंब मध्यकालीन शहरी जीवन की जटिल आर्थिक-सांस्कृतिक संरचना से गहरे जुड़े हुए हैं। यह लेख तर्क करता है कि कबीर का काव्य केवल आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है, बल्कि अपने समय के सामाजिक-आर्थिक यथार्थ का तीक्ष्ण प्रतिवाद भी है।

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Published

2013-2025

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Articles