प्रेमचंद का बाल साहित्य: व्यक्तित्व निर्माण, नैतिक मूल्य और सामाजिक यथार्थ का एक समेकित विश्लेषण
DOI:
https://doi.org/10.8855/m4m07g21Abstract
'बाल साहित्य' शब्द का शाब्दिक अर्थ है बच्चों के लिए निर्मित साहित्य, लेकिन साहित्यिक विमर्श में इसकी परिभाषा केवल आयु-सीमा तक सीमित नहीं रहती। बाल साहित्य वह विधा है जो बाल पाठकों की मानसिकता, संवेदनशीलता, कल्पनाशक्ति और विकासशील चेतना को लक्ष्य करके लिखी जाती है। साहित्य सामान्यतः जनजीवन का दर्पण है, और यह सिद्धांत बाल साहित्य पर भी समान रूप से लागू होता है। साहित्य चाहे प्रौढ़ हो या बाल, उसकी प्रकृति और प्रयोजन एक ही है—जीवन का चित्रण और मानव चेतना को उन्नत करना। लेकिन बाल साहित्य के संबंध में पाठक की आयु का प्रश्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि बाल-मनोविज्ञान की संरचना, उसकी जरूरतें, उसकी जिज्ञासाएँ और उसकी सीखने की क्षमता प्रौढ़ पाठक से अलग होती है। यही आयु-अंतराल ही है जिसके कारण सामान्य साहित्य के समांतराल बाल साहित्य के सृजन की आवश्यकता सुलभ और अनिवार्य हो गई है।
