लोक सािहत्य का गढ़वाली काव्य में सṪस्कृितक चेतना

Authors

  • डॉ0मीना Author

DOI:

https://doi.org/10.8855/zcfxw864

Abstract

लोक सािहत्य लोक और सािहत्य दो शब्दों के मेल से बना है सािहत्य में व णत लोक शब्द के अथ´ को आचाय´ हजारी प्रसाद िद्ववेदी ने बहुत ही सटीक शब्दों में व्याख्याियत िकया िक लोक का अथ´ नगरों एवं गṪव में फैली उस समूची जनता से है जो प रष्कृत रुिच संपन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अिधक सरल तथा अकृित्रम जीवन की अभ्यस्त होती है िजनके व्यावहा रक ज्ञान का आधार पुस्तक नहीं है अपनी संस्कृित के द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी जीवंत रखने की क्षमता रखती है।

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Published

2013-2024