रमणिका गुप्ता के साहित्य में दलित चेतना : विचार, संघर्ष और सामाजिक सरोकार
DOI:
https://doi.org/10.8855/b2x3ed19Abstract
हिंदी साहित्य में दलित विमर्श सामाजिक यथार्थ को समझने और सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए एक महत्वपूर्ण वैचारिक धारा के रूप में उभरा है। इस विमर्श ने उन वर्गों के अनुभवों, संघर्षों और पीड़ा को अभिव्यक्ति दी है, जिन्हें लंबे समय तक मुख्यधारा के साहित्य में पर्याप्त स्थान नहीं मिला। रमणिका गुप्ता का साहित्य इसी वैचारिक परंपरा का सशक्त प्रतिनिधि है। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से दलित, आदिवासी, मजदूर और स्त्री जीवन की वास्तविकताओं को उजागर किया है तथा सामाजिक अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की चेतना को स्वर दिया है। उनकी कहानियों, उपन्यासों, कविताओं और आत्मकथा में दलित समाज की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक समस्याओं का यथार्थ चित्रण मिलता है। उनकी आत्मकथा “हादसे” व्यक्तिगत अनुभवों के साथ-साथ सामाजिक संघर्षों का दस्तावेज़ बन जाती है। रमणिका गुप्ता ने अपने साहित्य के साथ-साथ सामाजिक आंदोलनों और पत्रिका के माध्यम से भी दलित और हाशिए के समाज की आवाज़ को मंच प्रदान किया। उनके लेखन में दलित अस्मिता, स्त्री-स्वतंत्रता, श्रम की गरिमा और सामाजिक समानता की आकांक्षा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इस प्रकार उनका साहित्य दलित चेतना को केवल पीड़ा की अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रखता, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और मानवीय गरिमा की स्थापना की दिशा में सक्रिय हस्तक्षेप करता है।
