संत काव्य परम्परा में संत रविदास का सामाजिक योगदान

Authors

  • डाॅ॰ हरि ओम फुलिया Author

DOI:

https://doi.org/10.8855/kgvbep33

Abstract

हिन्दी साहित्य में कबीर पर इतना कुछ लिखा जा चुका है फिर भी कबीर की वाणी से आलोकित भाव उर्मियां अनेक रंगतों में नये-नये प्रभाव छोड़ती हैं । आज विश्व की जो समग्र स्थिति है उसके रक्त रंतजि पृष्ठों पर से रक्त की छींटे पोंछने के लिये और रक्त के इस प्रकार को रोकने के लिये कबीर - साहित्य का पुनर्मूल्यांकन शोध की मांग करता है । कबीर की अपने-अपने ढंग से व्याख्या की गयी है परन्तु विज्ञान इस मत से सहमत हैं कि कबीर को अभी पूरी तरह से समझा नहीं गया है । शोध की अपनी दिशा और प्रक्रिया होती है । जिससे उस विषय के अतीत - वर्तमान और भविष्य को नयी नयी स्थापनाओं और खोजों को क्रमबद्ध किया जाता है । इस प्रक्रिया में कबीर वाणी को नये ढंग से खोज परख कर नयी स्थापनाओं के साथ बराबर विवेचित किया जाना आधुनिक सन्दर्भों में अनिवार्य हो गया है । कबीर केवल भक्त कवि थे या समाज सुधारक या महान - कवि या सबसे ऊपर एक मानववादी समाज शास्त्री ? हर स्थिति नये ढंग से प्रश्नों की अनुचित श्रृंखलां बनती जा रही है और शोधकर्त्ता भी बनी-बनायी एक लीक पर शोध ग्रंथ के पन्ने भरकर रचनात्मक दायित्व से हाथ झाड़ लेते हैं । 

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Published

2013-2025