डाॅ. कुँवर नारायण के काव्य में धार्मिक-दार्षनिक मूल्य
DOI:
https://doi.org/10.8855/fm1rwc60Abstract
श्री कुँवर नारायीलनण जी हिन्दी साहित्य में गघ लेखन के बावजूद भी कवि रूप में अधिक प्रसिद्ध है। ये अपने काव्य में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का दावा करने वाले कवि हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इनका अभिप्राय उस बौद्धिक स्वतंत्रता से है, जो सदा से जीवन के प्रति निडर और अन्वेषी प्रष्न उठाती रही है। इनके काव्य में यथार्थ का खुरदरापन भी मिलता है, और उसका सहज-सौन्दर्य भी मिलता है। ये जीवन के संघषों से जूझते हुए अपने आपको कहीं परास्त नहीं पाते। इनकी कविताओं में संषय संभ्रम, प्रषनाकुलता बीज शब्द के रूप में विघमान है। आलोचकों का मानना है कि इनकी कविता में व्यर्थ का उलझाव, अरव़बारी सतहीपन और वैचारिक धुंध ही बजाय संयम, परिष्कार और साफ-सुथरापन झलकता है।
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2013-2025
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Section
Articles