प्रेमचन्द के उपन्यासों में स्वराज के प्रति जागरूकता
DOI:
https://doi.org/10.8855/2sw25x87Abstract
स्वतंत्रता प्राप्ति उस समय देश की प्रमुख माँग थी। स्वतंत्रता का अपना अलग-अलग स्वरूप था। नगरों में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जो आन्दोलन चल रहे थे, उसका मूल उद्देश्य विदेशी शासन से मुक्ति प्राप्त करना था। देहातों की स्थिति इसके विपरीत थी। यहाँ दोहरी शासन-व्यवस्था थी। एक शासन विदेशी सरकार था और दूसरा उन शासकों का था, जो सरकार की सत्ता बनाये रखने में उसके प्रबल समर्थक और हितैषी थे। इन शोषकों में जमींदार, कारिन्दे, सरकारी अधिकारी और महाजन थे। देहातों में विदेशी सरकार के प्रभुत्व से मुक्त होने के साथ-साथ इन शोषकों की बढ़ती फैलती शक्ति से भी बचना था। स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रमुख साधन स्वराज्य स्वीकार किया गया। यह गांधी जी तथा उनके समर्थकों की प्रबल पुकार थी। प्रेमचन्द का लक्ष्य था कि धीरे-धीरे उत्पादन के साधनों पर समाज का अधिकार हो जाय। स्वराज्य राष्ट्रीयता वाला अर्थ उन्होंने ग्रहण न किया था। आवश्यकता इसी बात की न थी कि अंग्रेजों को निकाल बाहर किया जाय, वरन् इस बात की भी उनके साथ समाज की व्यवस्था में भी परिवर्तन हो जाय।