धर्म के दर्पण में मिथक और ईश्वर
DOI:
https://doi.org/10.8855/jbwb8q65Abstract
यह शोध पत्र मुख्यतः धर्म और ईश्वर की प्राचीनता, उद्धव एवं विकास पर केंद्रित है। धर्म के विकास में मिथक कैसे सहायक होते हैं तथा मिथक किस प्रकार प्रतीकात्मक अर्थ प्रदान कर सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने में योगदान देते हैं इस पर शोध पत्र में विचार किया गया है। अलग-अलग संदर्भ में धर्म के अलग-अलग अर्थ होते हैं फिर भी धर्म का अर्थ, धर्म की परिभाषा, धर्म के प्राचीन तत्व इत्यादि समझने में संबंधित शोध पत्र बेहद उपयोगी है। अधिकांश धर्म में उपस्थिति पात्र जिसे ईश्वर की संज्ञा दी जाती है की कल्पना के आधार को तार्किकता की कसौटी पर रखकर समझने का प्रयास किया गया है। धर्म व ईश्वर के विकास के आधारभूत कारणों जैसे डर व सामाजिक व्यवस्था पर तर्क प्रस्तुत किए गए हैं। पाषाण काल की कब्रों से मिले पुरातात्विक साक्ष्य जो पारलोकिकता की ओर संकेत करते हैं को धर्म के आरंभिक स्वरूप के हिस्से के तौर पर देखा गया है। धर्म और ईश्वर के उद्भव और विकास में डर की अहम भूमिका रही जिस पर यह शोध पत्र पाठकों का ध्यान केंद्रित करने का प्रयास करता है। अतः यह शोध पत्र धर्म और ईश्वर की जड़ों की गहनता से छानबीन कर एक तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करने का प्रयास करता है।