उषाकिरण खान के उपन्यासों में आंचलिक तत्व
DOI:
https://doi.org/10.8855/mfzttz59Abstract
मैथिली एवं हिन्दी की प्रख्यात उपन्यासकार उषाकिरण खान ने आंचलिक उपन्यास परंपरा को समकालीन संदर्भों में नवीन संवेदना और यथार्थपरकता प्रदान की है। उनकी कृतियाँ फणीश्वरनाथ रेणु और नागार्जुन द्वारा स्थापित आंचलिक धारा की उत्तराधिकारी होते हुए भी उसे विस्तृत एवं आधुनिक आयाम प्रदान करती हैं। उषाकिरण खान ने अपने उपन्यासों में बिहार, विशेषतः मिथिलांचल के ग्रामीण जीवन को केंद्र में रखकर वहाँ की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना, रीति-रिवाज, लोकाचार, वेश-भूषा, खान-पान, पर्व-त्योहार तथा लोक-मानस का अत्यंत सूक्ष्म एवं जीवंत चित्रण किया है। उनके उपन्यासों में आंचलिकता केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह लोक-संस्कृति, लोक-भाषा और जनजीवन की विविध संवेदनाओं के माध्यम से व्यापक मानवीय अनुभवों का रूप ग्रहण कर लेती है। वे क्षेत्रीय जीवन के संघर्ष, सामाजिक विषमताओं, स्त्री-जीवन की जटिलताओं तथा बदलते समय के प्रभावों को अत्यंत मार्मिकता और प्रामाणिकता के साथ अभिव्यक्त करती हैं। उषाकिरण खान की रचनात्मकता का विशेष पक्ष यह है कि वे परंपरा और आधुनिकता के मध्य संतुलन स्थापित करती हैं। एक ओर वे लोक-संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का कार्य करती हैं, वहीं दूसरी ओर आधुनिक चेतना, स्त्री-स्वतंत्रता, शिक्षा और आत्मनिर्भरता जैसे नवीन मूल्यों को भी अपने कथानकों में समाहित करती हैं। इस प्रकार, उनके उपन्यास आंचलिक तत्वों की दृष्टि से समृद्ध होने के साथ-साथ व्यापक सामाजिक सरोकारों से भी जुड़े हुए हैं। वे आंचलिक उपन्यास को केवल क्षेत्रीयता तक सीमित न रखकर उसे सार्वभौमिक मानवीय अनुभवों का दस्तावेज़ बना देती हैं, जिससे उनकी रचनाएँ समकालीन हिन्दी उपन्यास परंपरा में विशिष्ट स्थान प्राप्त करती हैं।
