आदिकालीन हिन्दी साहित्य का विवेचन

Authors

  • डॉ. रजनी सोलंकी Author

DOI:

https://doi.org/10.8855/98mrex37

Abstract

 

 

आदिकालीन हिंदी साहित्य हिंदी साहित्य का प्रारंभिक युग है, जो लगभग 7वीं शताब्दी से लेकर 14वीं शताब्दी तक माना जाता है। इस काल में हिंदी भाषा का विकास हुआ और प्राचीन बोलियों से साहित्यिक रूपों का समुचित सृजन हुआ। इस युग को वीरगाथा काल भी कहा जाता है क्योंकि इस काल के साहित्य में वीरता की गाथाओं का प्रमुख स्थान था। आदिकालीन साहित्य मुख्यतः लोक-भाषा में था, जो आम जनता के जीवन, उनके संघर्षों और भावनाओं को प्रभावशाली रूप से प्रकट करता था। इसके अतिरिक्त, इस काल में युद्धों का सजीव वर्णन, राजाओं और योद्धाओं की महिमा और वीर रस की प्रधानता विशेष रुप से देखी जाती है। इस काल के साहित्य में श्रृंगार रस सहायक रूप में भी उपस्थित था। आदिकाल में हिंदी साहित्य की भाषा अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, बिहारी जैसी लोक बोलियों का समिश्रण थी, जो सरल और प्रवाहमय होने के कारण आम जनता के लिए सुलभ थी। इस काल की भाषा में प्राकृतिक अभिव्यक्ति की प्रधानता थी ताकि भावपूर्णता और संवादिता बनी रहे। शैली में वीर रस और भक्ति रस प्रमुख थे, जो साहित्य की आत्मा माने जाते हैं। कविता में गाथा , दोहा, चौपाई जैसे छंदों का अधिक प्रयोग होता था, जिनमें लोक गीतों की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। इस युग के साहित्य में भावों की सूक्ष्मता के साथ-साथ सरलता एवं सहजता विशेष रूप से देखी जाती है।

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Published

2013-2026