हिंदी उपन्यासों में अकाल-महामारी और मानवीय संवेदनाओं का विघटन

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DOI:

https://doi.org/10.8855/rfe15474

Abstract

हिंदी उपन्यासों में अकाल और महामारी केवल प्राकृतिक अथवा स्वास्थ्य संबंधी आपदाएँ नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक विषमता, आर्थिक शोषण, सत्ता-व्यवस्था की विफलता और मानवीय संवेदनाओं के संकट को उजागर करने वाली परिस्थितियाँ हैं। अकाल की विभीषिका में भूख, बेरोजगारी, विस्थापन और अभाव मनुष्य के जीवन को प्रभावित करते हैं, जबकि महामारी भय, मृत्यु, असुरक्षा और सामाजिक अलगाव को जन्म देती है। इन दोनों स्थितियों में मनुष्य के पारस्परिक संबंधों, नैतिक मूल्यों और सामुदायिक चेतना की वास्तविक परीक्षा होती है।

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2013-2026

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Articles